बुधवार, 5 जून 2013

yaad-5- यादें... याद आती है बातें...बातें भूल जाती है ...


... इतना आसान नहीं होता जवान मौत को भुला देना, ... दिल दिमाग काम नहीं कर रहा था ... दिल किया इसके बिना जी कर क्या जीना , ..... जवान मौत को कंधा देना .. .. आसान नहीं, देह का बोझ नहीं .कोई नहीं , कुछ भी नहीं ..... मन का बोझ नहीं उठाया जाता ........ और हो भी क्यों ना .... छोटी बहोत छोटी उम्र की मौत ही इतनी दुःख दाई होती है , भुलाये नहीं भूलती ता उम्र ... फिर जवान मौत तो न जाने क्या कुछ कर गुजरती है ... ख़तम हो जाता है सब कुछ ... शायद ... मैं नहीं कहती ...देखा सुना भर है, ...... .............. रुदन आसमान का सीना चीर देता है,... धरती फटे तो समां जाए वो जिसने पला था उसे , उसकी जवानी की बारातो के सपने सजाये थे , .....ऐसी मौत की शहनाइयां फिर गाती फिरती है ... वो गीत जो बन जाते है हर एक के लबो की प्यास , सुर्खी और करते है आराम पलकों की छाँव तले सपनो के गाँव में ......... हाँ जवान मौत का बोझ कुछ हल्का कर देते है ऐसे तराने जो उतर आते है कागज़ पर और सोते है वैसे ही जैसे वो जवान शव अब पड़ा होता है ख़ाक हो मन की दुनिया के शमशान में .... दफ़न .... ओढ़ कर यादो का कफ़न ..................... हाँ प्यार जवान हुआ ही था की ..... मौत आ गयी और अब ......... अब ... तक तो मेरी तरह जीवन की दोपहरी में सुस्ता रहा होता गर जिंदा होता ........ देख रहा होता अपने आँगन की बगिया में अपने को महकता .......................... . 


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