गुरुवार, 6 जून 2013

मुहब्बत के नाम जो ख़ाक हो गए ... उनको मेरा सलाम या रब


मुहब्बत के नाम  जो ख़ाक हो गए .... उनको मेरा सलाम या रब 
        
  (1)

.......इक आफताब-ए-इश्क की मस्रूफियतों से परेशान 
बहार-ए-चमन, नूर-ए-बहार खो गइ फिजाओं में 
इस कदर, ओढ़ धरती का दामन सो गई इस कदर 
अब नाम-ओ-निशाँ मिटा दो मुहब्बत के सभी 
ना चाहे टूट कर अब ज़माने में किसी बेबवफा को कोई इस कदर ..  

     (2)

ना कर बे-बफई इस कदर या रब 
गुरुर-ए-मुहब्बत है एक आब-ए-मुक़द्दर या रब,
नहीं हर किसी की किस्मत कर ले खुद को, 
खुद सुपुर्द ये ख़ाक या रब ...
मुहब्बत के नाम  जो ख़ाक हो गए .... उनको मेरा सलाम या रब 

(3)

आओ कुछ गुंचे नज़्म के उनके नाम करें 
एक पल तो  उनकी भी रूह को आराम मिले 
पा कर गुमनाम सी ग़ज़ल में खुद को 
कुछ पल तो एक नई नज़्म  को आराम मिले
खुश तो होगी वो भी ये सोच कर उसकी भी 
मुहब्बत को कोई तो मुकाम मिले ...
मुहब्बत के नाम  जो ख़ाक हो गए .... उनको मेरा सलाम या रब   ... आमीन  

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