सोमवार, 3 जून 2013

कजरी कि साधना

कजरी  कि  साधना


                                   पौ साथ फटने के साथ ही खाट से उठ खड़ी हुई, काली मिटटी के मटके से एक गडवी पानी भर कुल्ला किया मुह पर दो तीन छपाके मारे, पानी पिया पास ही  ताक में रखा शीशा उठाया खुद को देखा और मुस्कुराई, बाल कुछ ठीक किये  सरर सर्र पीली सीन्खो की झाड़ू से सारा दलिदर बहार निकाल कोठरी के बहार डाले चूल्हे  के  पास रखे नीली बत्ती के स्टोव पर चाय के लिए सिल्वर के टोपिय में पानी , दूध , चाय पत्ती चीनी सब एक साथ डाल कर, बद्री को हाथ से हल्का सा छु कर कह  गई ....... 

 हम नहाने जा रही है , 'चाय सम्हाल लीजो ' , ठीक है , बद्री आँखें बंद किये किये ही बोला .. 

वाह ! क्या चाय बनाई है, ... तुहार हाथ मा जादू है , ...

अच्छा ..हा हा हा .. सच चल फिर वापस अभी हाल तो ५ ही बजा है हाथ का जादू दिखाई देत है ....

चलो  हटो बेशर्म न होवे तो कहीं के ....... 

अरे अरे .... कहे बेशर्म, तुम ही तो बोली अभी अभी ...

चलो उठो नहा के तनिक अगरबत्ती लगे दयो दीवाल में बालाजी के आगे कछु साद बुद्धि दे देब ही

उ हूँ .. हम नहीं जायेंगे पहले तुम यहाँ आओ, 'क्या है, सुन आज कारखाने चलते वक़्त तू वोही गुलाबी साडी पहनियो, तुझे देख थकान ना होय हम का ..... गुलाबी साडी, में तू और भी गुलाबी हो जात है फिर काम साला बहुत ही हल्का लगत है, जैसे तेरी गुलाबी साडी न होय , कोई टॉनिकवा  होय' ... कजरी हाथ बद्री की आँखों के आगे फिरा कर बोली

जमीं पे आ जा चल नह ले तब तक हम दो टूक पका लई .. आम के अचार से खाई के पानी पि लेब ते आसरा लग जाई  है ',  चल ठीक है कह कर बद्री नहाने चला गया ... 

ला  कुछ  सत्तू दे दे    ये लो .. देखो सूरज  चढ़ आया चलो अब ताला लगा के चलो कारखाने ठेकेदार न मालुम   ही नहीं है क्या ,   कितने बजे भी जाओ सामने खड़ा  है ...... हा हा अह आहा हां।

दोनों एक १० मंजिला इमारत में मजदूरी कर अपना गुजारा कर रहे थे किसी साधू के धूप  - ध्यान सा उनका जीवन सीधा सरल , गाँव में खेती की जमीन जमींदार ने हड़प ली , उसी गम में बापू    चल बसा ,  कच्चे कंधो पर परिवार का बोझ डाल , माँ दिन रात बापू की  में रो रो कर  अंधी   हो गई ,  जैसे तैसे बिरादरी की एक लड़की   देख जीवन संगिनी ला दी थी बद्री को ,  खुश था कजरी को पा कर ... जैसे करोडपति हो गया था, दहेज़ में कजरी भी गोरा चिट्टा गुलाबी मुस्कान वाला रूप  लायी थी बद्री के लिए, संस्कार माँ ने कन्यादान में दिए थे, मजबूत इरादे और हिम्मत से पिता ने झोली भर दी थी, .... हर हाल में बद्री को खुश रखने की सौगंध ली थी अग्नि फेरो के वक़्त, ... और पूरी शिद्दत से निभा रही थी, कारखाने पर मजदूरी के वक़्त के अलावा  राजा रानी थे दोनों एक दुसरे के लिए ..
अमावास का बड़ा इन्तिज़ार करते दोनों ..... 

 दोपहर तक दोनों काम में लगे रहे, वो चुनाई करता रहा, कजरी रोड़ी, बजरी, सीमेंट, पकडाने का काम करती रही, जब जब नज़रे मिल जाती बद्री उसको आँख मार छेड़ता, कजरी और फुर्तीली हो जाती, थकान भूल जाती शर्म से चेहरा लाल हो जाता,  आ जाती चेहरे पे

कोई देख ले तो, 'तो - तो क्या,  मेरी घरवाली ... हूँ ह देख ले, देखे दस बार देखे साला, देख देख के कलेजवा तंदूरी मुर्गा हो जाई हमार का जाई ... चल तू पानी पिला पियास के मारे मर जा ही वर्ना ... 

कजरी सुराही की गर्दन पकड़ गिलास भरते हुए ... तुम भी ना ... सुधर ना ही सकत इस मामला में बद्री पानी का गिलास एक ही घूँट में गटक कर ... सुधर गए तो तुम ही पछताओगी ..हा हा हां अहह 
चल कुछ देर आराम कर ले .... 
दोनों की यही दिनचर्या थी, आराम कर फिर से काम में लग गए ,  शाम को ठेकेदार आया , छुट्टी होने ही वाली थी सब मजदूर हाथ धो रहे थे 

दोनों की यही दिनचर्या थी, आराम कर फिर से काम में लग गए ,  शाम को ठेकेदार आया , छुट्टी होने ही वाली थी सब मजदूर हाथ धो रहे थे .. बद्री ओ बद्री तनिक यहाँ आओ तो ....ठेकेदार ने पी रखी थी कोइ बड़ी बात नहीं थी .

.. जी मालिक, सुन तेरी घरवाली कहाँ है,  ' जी ' वो  वहां कमली से बतिया रही है 
सुन .. तेरी घरवाली को आज यही रुकना है रात पूरी ...  दुगुनी  मजदूरी मिलेगी, खाना भी, लेकिन मालिक हम दोनों रुक जाते 

.... अरे तेरा बाप मजूरी बाटेगा क्या ? जिसकी जरूरत होगी वही रुकेगा ... नहीं मालिक, हमको नहीं चाही दुगुनी मजदूरी .... कजरी ना ही रुक पाएगी,  नहीं मालिक, हमको नहीं चाही .... कजरी ना ही रुक पाएगी,

अरे मालिक मकान का हुकुम है कजरी रात रुक जाएगी आज रात पार्टी है  कोनो चाय पानी पकडाने का वास्ते कोई ढंग की नौकरानी की ज़रुरत होई, तब ही मालिक बोले .... 

लेकिन मालिक को कजरी ही क्यों, में क्यों नहीं , में क्यों नहीं पकड़ा सकता हूँ चाय पानी , अरे रात का वखत हम हमार कजरी को यु ही ...

तू तो पागल है, अरे कुछ नहीं होई भाई तुहार कजरी का कोई चाट मसाला भई जा के कोई भी चट से चट कर जाई ...
नहीं मालिक .. अब हमका आगया देइ . नाही बद्री ... तू हमर हुकुम ताल सकत है मालिक मकान का ना ही, उ बहुत ही बड़ा आदमी है,  पैसे वाला और फिर हमारा हम सब का पेट पाल रहा है ऐसे कैसे मना  कर देइ  बद्री .. देख ली भैया कल को ... तुहार नौकरी चली जाय तो हमका न दोष मढ़ी !

..... क्यों मालिक हम ऐसा क्या गुनाह कर दिए ... हमका नहीं पसंद तो नहीं पसंद ...,  इतने में लहराती सी कजरी गुलाबी साडी में खिले गुलाब सी, दिन भर की हाड तोड़  के  की गंध में लिपटी, वहां आ पहुंची ... ठेकेदार से जरा घूँघट कर .. बद्री से मुखातिब हो , इशारे से क्या हुआ , .. बद्री कुछ  कहता उस से पहले ..ठेकेदार लाल आँखे करता हुआ, देख कजरी  वैसे   तो तुम ठहरे नीच जात के, फिर भी मालिक मकान तुम्हारे रहन सहन से  खुश है, .. आज रात यहाँ कुछ  दोस्तों   को पार्टी दे रहे, तुझे काम काज निपटने को रुकने के लिए बोले है , दुगुनी मजदूरी देंगे खाना साथ में ,तो कल की छुट्टी कर ली जो,  उसके भी पैसे दिलवा दूंगा। ... लेकिन ये बद्री पगला गया है, कहत है नहीं ... ये नहीं हो सकत, ... लगत रही बद्री को तुम पर भरोसा नाही कजरी, एक रात में कोनो तुमका मालिक मकान गटक लेइ !

ठीक कहत हो ... जे दो पैसे बचे ते का बुराई भई, हम देइ बद्री को ... हाँ समझा दयो .. नहीं तो कल से अपना  कहीं और कर लई ...

ना .. ना ठेकेदार जी इहा खादान का  बीहड़ मा हम कहा जाई तुम फिकर न करो हम बद्री को मन लई   का काम है, करना तो पड़ेगा ..... 

.... देख कजरी हम तेरे बिना  घर न जाही... अरे हम कोनो बिदेश्बा जा रही .... तुम भी न ... मर्द हो ही के .. ऐसी औरतन जैसी बातें कर रहे ...हम यहीं है , रात की ही तो बात भई ... कोई परेसानी नहीं .... 

ठीक है ... कह कर बद्री बेमन से घर चला गया ... ... रात भर बेचैनी सी रही ... आँख एक पल को न मिची सवेरे उठा नह धो तुरत  कजरी के लिए सत्तू और रोटी ले ...   कारखाने की तरफ ...  दिमाग में न मालूम क्या क्या  आ रहे थे ... कजरी ओ कजरी......कहाँ है तू

..... हम इयाह हा बद्री .... इधर देखो ... गहरा सन्नाटा ... क्या हुआ सब गए भी क्या ? हाँ सब के सब गए ससुरे अब दुबारा  के नहीं आई बे ....

का हुआ कजरी ..... सब ठीक  तो हा तू तू सामने क्यों नहीं आती .... 

इह लो ... सामने आ गई बद्री ... अरे ये क्या? तुहार गुलाबी साडी .. ये .. खून के धब्बे ... ये चाक़ू ... ये क्या है? कजरी बोल बोल न....

रात मालिक मकान की कोई पार्टी न थी , उह वो साला ठेकेदार .. जब सब लोग चले गए उ ह हमार इज्ज़त्वा पे आँख धर लै ...हम तो तब ही  गए रहे , तुम्हारे सामने ही .....  कई दिन से परेसान कर रहा हमका , कल कमली भी बता    रही, इस कारखाने की  मजदूरिन उ का  पेट पाल रही, चुप रह रह , सह रही, ....  हमने ठान लई बा पहले ही ...  जा दिन इह कमीना हमार माथे लगी हम इक ऐसा मजा देइबे की इका सब हिसाब चुकता कर दै , सो कर दिए .... ...... अब तुम जानो तुम्हार काम बद्री चल बथथल रख काम करी ..... 

अरे लेकिन पुलिस .... अब पुलिस तुमका पकड़ लेइ , जेल हो जाई , ... अरे हमारा का होई ... कजरी ये तू का की ....
पुलिस .. काहे का  किये हम .. कहे चिल्ला रहे .. उह कमीना को हमने मारा नाही बद्री .... तो ...
उसकी हमने  हमेशा की वो नस ही काट दी जा से वो पापी पाप कर रहा .........
अब वो पुलिस    को का कह के रिपोर्ट लिख्वाही , ये की कजरी को पकड़ लो उह हमका नपुंसक  कर दै , हिंजड़ा कर दै ... तब का पुलिस उह का पुरूस्कार दै बा ..... 
 बद्री को माँ काली का भद्र रूप दिखा उस खिले चेहरे में .. दोनों पैरो के अंगूठे को छु कर आशीष लिया .. कजरी भी भावुक हो बद्री को सीने से लगा खूब रोई खूब रोई ... फिर बोली हम तुहार इज्ज़त का वास्ते उह  की जान ले भी सकते थे लेकिन इस    से हमारी घर गृहस्ती की साधना भंग हो जाती .... दोनों एक दुसरे का हाथ कस कर पकड़ लिए और अपने घर की और चल दिए ... पीछे ... पीछे मुड कर ...  देखना नहीं सिखा था उसने मेहनत करना  था , दुसरे दिन दोनों नए कारखाने की  में निकल लिए। 

  लेखिका -Anita Rathi

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