शनिवार, 8 जून 2013

Aameen



(21)
सितमगर बहोत शोर बरपाया तुमने 
लो अहले चमन में आज महफिल है 

(22)
.... तुम अपना हुनर आजमाओ  
रस्म - -  अदायगी हम करें 

(23)
...... आरज़ू थी, मगर अब फरेब--जिंदगी है ऐसा क्यों  लगता है 
....खामोश सा  खुद ही के अन्दर ये आतिश दहकता है 

(24)
.ऐसे हालात में कैसे रहते है ये मेरी ही बस्ती के लोग 
लगता है जहर पी पी कर आग उगलते है ये मेरी बस्ती के लोग 

(25)
अगर टूट कर  बादल तो बह जाएँगी बस्तिया महसूर होता है 
चुप सी है मगर फूटेगा ज्वालामुखी एक दिन ऐसा क्यों लगता है .........

(26)
चाँद के साथ देखिये सितारे अब चमके 
 दोस्ती के आँगन में नज़ारे है   दमके 

(27)
वो जो आये शाम के साए से है   ...........
कुछ वो घबराये से है कुछ ये शरमाये से है 



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