Part : 3
cont.... शाम को कॉलेज से घर लौटी तो दोनों बच्चे खेल रहे थे मुझे देख लिपट गए , मम्मी आ गई - मम्मी आ गई की रटंत लगा दी, थोडा छोटी को गोद में उठा प्यार किया , बड़े का सर पलुस में अपने लिए चाय का पानी गैस
पर रख कर लाईटर से गैस ओं कर इनके पास जा बैठी , कुछ पल सांस लेकर
चाय बना कर लायी , बच्चो को दूध पकडाया, फिर खुद आराम से पालथी मार कर बैठ चाय की
चुस्कियां भरने लगी! शाम हलकी हो चली थी अचानक ध्यान गया तेज तेज ची ची ची ची की
आवाजे आने लगी, की हुआ है अब क्यों इतनी ची ची ची ची लगा राखी
है इस छिड़ी ने, जाकर देखा घोंसले की मालकिन ने नया चिड़ा ढूंढ
लिया था, सभ्य शालीन सा दिख रहा है. छिड़ी के पास बैठा कम
ही ची ची करता, पहले वाला चिड़ा उसको देख जोर जोर से ची ची ची
ची किये ही जा रहा हा कभी कभी बीच में उद्द उड़ कर उस पर झपटने की कोशिश भी करने
लगा! मन में आया ये चिड़ा देखो कितना शातिर है, पहले जब खुद छिड़ी
को मुसीबत में छोड़ अपनी जिम्मेदारी पूरी किये बिना चला गया, तिस पर ये की बिचारी की छाती पे लाकर सौतन बिठा
दी, घर छिनने लगा था....... आज ये अपना साथी ले आई
तो देखो आधे घंटे में ही कोहराम मचा दिया.. मुझा मजा आने लगा, छिड़ी की समझदारी पे फक्र महसूस कने लगी, जैसे मेरे और छिड़ी के बीच कोई उन्बोला रिश्ता
हो, वो मेरे मन की भांप गई और वो कर भी दिखाया, शाबास मेरी लाडो अब हुई न बात, मजा तब और आया जब मैंने देखा दोनों चिड़ियाँ चुप बैठी एक दुसरे को देखती, फिर दोनों चीड़ो को देखती, और मजा ये वो दोनों मुर्ख चिडे इस कदर लड़ रहे ठी
की आज एक दुसरे की जान लेकर ही दम लेंगे! रात गहरा गई थी लिकिन उनकी ची ची ची ची
में कोई कमी नहीं थी बल्कि अब तो मौका बा मौका एक दुसरे पे हमला भी करने लगे ........ रात कब शांत हुए की न हुए, मेरी आँख लग गई....आँख लगी तो ....सुबह उन् दोनों की ची ची ची चाय चाय से ही खुली, हे भगवन इनको देखो क्या अखाडा लगा रखा है हम
इंसानों की एक लिमिट है हमारा घर, इन जानवरों की
कोई हद्द नि, कमरे में, बाथरूम में, द्रविंग रूम में जहाँ उड़ कर पहुच सकते हा पहुच जाते है..... पूरा दिन का कोहराम हो गया था कभी कभार दोनों को बुरी तरह उलझा देख
चिड़िया बीच बचाव के लिए आती मगर उनको तो जैसे एकदूसरे की जान ही चाहिए थी.... बच्चो को तैयार कर स्कूल बस में बिठा खुद कॉलेज
जाने की तयारी में जुट गई,
कॉलेज गयी तब तक दोनों कभी फर्श पर, कभी मुंडेर पर लड़
लड़ क्र अपनी ची ची से मोहल्ला सर पर उठा रहे थे! दोनों ही
नासमझो की तरह लड़ लड़ कर एक दुसरे को लहू लुहान लार चुके थे सर के पंख नोच नोच कर
बदसूरत हो गए...
लेकिन न पहला जाने को तैयार न नया, ......क्या फितरत हा पहले की न खाऊ न खाने दू .... सुना था तन की अगन मन
की अगन से जियादा जलती है साक्षात् दिख रहा था, कितनी तड़प, इतनी जलन ये छिड़ी
से भी तो पूछ लो मूर्खो वो क्या चाहती है, लेकिन कतो, सदियों से जो
इन्होने देखा सुना घरों में वही तो करेंगे, करेंगे वही जो
करते आये है, हवा चाहे पशिम से बहने लगे इनको नहीं बदल सकती....चिड़ि घोसले
में चुप चाप बैठी थी ! ऑफिस से लौटते
वक़्त मन में एक कोतुहल था, किसी मनपसंद सीरियल की अगली कड़ी में अब क्या होगा जान लेने जैसा... जल्दी अपनी गाड़ी उठाई और घर पहुंची, घर में कदम रखा देखा एक अजीब सी शांति
पसरी थी मन आशंकित हो उठा!
बच्चे हमेशा की तरह आकर लिपटे तो छोटी (बेटी) की आँखे आंसुओ से भीगी देखि, बेटा उसकी हंसी उड़ा रहा था, माँ देखो ये गुमसुम रोये जा रही हा सुबक सुबक
कर, मैंने उसकी तरफ निगाह ऐसे उठाई की बेटे को ये
भ्न्पते देर न लगी की माँ गलत सोच रही है की उसने छोटी से लड़ाई की है, वो हंसता हुआ बोला ये पागल उन मरे पड़े दो चीड़ो
के लिए रो रही है, मुह से हाय निकला, मैंने कहा ची ऐसे नहीं बोलते... उसने जवाब दिया
नही विश्वास तो जाकर खुद ही देख लो न में चला किर्केट खेलने दोस्तों के साथ और
हँसता हुआ अपना बेट लेकर गार्डेन की तरफ दौड़ गया, छोटी के आंसू
पोछते पोछते पिछवाड़े जाकर
देखा, एक टूटी पुरानी साइकिल के नीचे दोनों चिडे दम तोड़ चुके थे समझना मुश्किल था
कोनसा गुनाहगार है.....मुह से हाय
राम निकल पड़ा, ... फिर सीडी का ख्याल
आया, उसके घोसले की तरफ देखा - ची बड़ी
मासूमियत के साथ अपने अपने साथी और जीवन साथी दोनों को खोकर
उदास सी अनंत में निहारती कभी घर आँगन में जैसे जुल्मी
के आने का
अभी भी इंतज़ार हो उसके बेरी मन को .. घर का आदमी घर का ही होता हा चाहे जितने जुल्म
ढा ले.... शाम गहरा गई
थी ! ----------सांझ का सूरज अपने घर को लौट चला था, शाम ढलने लगी, छिड़ी ने पंख फैलाये और फुर्र से उड़ कर जा बैठी अपनी मेहनत
से बनाये छोटे से घोंसले की इकलौती महारानी सी , अपना अस्तित्व समेटे आँखे मूँद अपनी चार दिवारी की नरमाहट
को महसूस करने की कोशिश में मगन हो गयी....... दूर एक कमजोर डाली के सहारे पर
सौतन चिड़ि अपने को बेघर महसूस कर कुम्तर अंक रही थी, न सर पे साया ही
था न अपना कोई आसमान! वहीँ उस
कमजोर डाली पर न जाने कितनी रातें बिताई आखिर कोई मनचला फिर उसको बहला फुसला रहा
था और वो भी संगिनी बनने लगी उसकी फिर न जाने कहाँ गई.... कुछ पता न चला
उसके अस्तित्व का.... ! लेकिन मेरे आँगन की वो प्यारी
चिड़ि वहीँ अपने घोसले में इत्मीनान से अपने मालिकाना हक के साथ बैठी नज़र आती, सुबह चीची कर मदुर
सुर भी छेदती, सिं में दाना पानी जुगाद्ती और शाम संध्या वंदन कर अपने नीड़ में घुस कर दुबक
जाती.....उसको देख मुझे
बरबस ही याद हो आती.. दादी माँ की वो सीख .. .... आदमी और गाँठ जोड़ी
पूँजी को ढीला नहीं छोड़ना चाहिए ..... ! अरे में तो
भूल ही गयी आपको इंतजार होगा इस चिड़ि के नाम का, आप सुझा सकते है कोई नाम, में तो नहीं सुझा सकती, इस चिड़ि का नाम
चाहे परवीना, रहिस या मीना चाहे जो हो चिड़ि तो चिड़ि है, एक चिड़ि, एक चिड़ि
स्थायित्व और अस्तित्व को खोजती चिड़ि, और भटकती उन्मुक्त
चिड़ि क्यों नहीं समझती दादी, नानी, माँ की दी हुई
नसीहतो को....... इन नसीहतो अमल में
लाना होगा, नहीं तो कैसे देख पाएगी अपने नीड़ को उजड़ता, नहीं सह पायेगी
सौत के अस्तित्व नन्ही सी चिड़ि नहीं सह पायेगी एक चिडी, ये एक चिड़िया कौन है क्या नाम है, कभी देखा है आपने किसी चिड़िया का नाम ..... नहीं न इसी लिए इस एक चिड़िया को मैंने भी एक चिड़िया ही नाम दिया
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