यादें याद आती है ..... बातें बातें भूल जाती है ....
..... चांदनी यूँ ही जब आँगन में आती है यादो के सिलसिले निकल पड़ते है गुजरते वक़्त का हाथ थामें और फिर चलने लगता है कोहरे की चादर ओढ़े यादों का काफिला .... फार्म हाउस के लॉन में ... खुले आसमान के नीचे मछरदानी लगे बिस्तर दोनों और टेबल फैन .... हवा भी छन कर आती, मोगरे और रात की रानी की मदहोश कर देने वाली अरोमा ... बाउंड्री वॉल के सहारे लाल और गुलाबी देशी गुलाबो की हेज ... संदल सी काया ... साँसों के नुपुर महके महके। नर्म मखमली घास का कालीन, आसमान पर पूरा चाँद, आधी कच्ची उम्र .... खुद ही में खोई खोई सी ..... काले घने गेन्सुओ से ढकी पीठ, कमर के घुमाव पर चलती पसीने की एक अनवरत बूँद .... बूँद की सर्रर्र सर्र्राहत .... दिल में बैचैनी ....सुरमई आँखों में ख्वाबो का सुरमा सजा लेती और घंटो तारों को निहारती, चकोर सी एक टक चाँद को देखना बहोत भाता ....... और उसी चांदनी में दूर थोड़ी दूर मैं लैंप की रौशनी में किताबो के ढेर से तुम्हे देखा करती ... पढ़ते पढ़ते ... नजरें मिली , तुमने भांप लिया था मुझे की में सिर्फ पन्ने पलट रही थी पढ़ तो तुम रही थी ..... मुझे और मैं तुम्हे , है न ... सोल्हा आने सच्ची बात ... कृष्ण और सुदामा की दोस्ती ... अभी जिंदा है , ...तुम्हारी यादें .......
bahut sunder
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