शनिवार, 15 जून 2013

अ: हवा ले चल मुझे ..... पतझर के पत्तो की मानिंद हवाओ में ...


: हवा ले चल मुझे ..... 
पतझर के पत्तो की मानिंद हवाओ में 
ले चल मुझे उस ओर, चुरा लो मुझे 
मेरी शाखों से और चुरा लो इस पिंजरे की 
कैद से, चट्टान से बने  पहाड़ की इस गुफा 
की कैद से, कर दो मुक्त समाज के इन 
ना-माकूल-फितरत-ये मुझ से,
कर दो मुक्त मुझे वासनाओ के जंजाल से 
ले उडो मुक्त आकाश की ऊंचाइयों में,
है कौन जिसने भटकाया मुझे 
मेरी राह -ये - रहगुजर से, अब कर दो 
न्याय आकर मेरे महबूब-ये-मेरे-खुदाया 
बनो बादल घने घनेरे छा जाओ मेरी हस्ती पर 
यूँ, के खो सी जाऊ में हवाओ में हवा बनकर 
ले जाओ वहाँ जहां न ये होश रहे मुझे मेरे 
 का और ले जाओ वहाँ जहां में खोई रहु 
उसमें जिसकी हु में ---- 
हाँ खुद में, खुद अपनी ही हो रहू मै .

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