गुरुवार, 27 जून 2013

Yaadein-10


....यादे याद आती है ....बातें भूल जाती है

.........  यादें ... कुछ तो था चाय के पियाले में यूँ ही नहीं तूफ़ान आया था, लहरों की तरह यादें दिमाग में ...  बातें जेहन में, किसी का बस नहीं चलता जब यादों के तूफान आते है। बेबस सी, बस स्टैंड पर खड़ी, मासूम चंचल निगाहें, निगाहों में पल पल बदलते सीन, कभी हकीकते तो कभी ख्वाब, ख्वाबो में भी वही एक सूरत ... कुछ ख़याल कर गर्दन घुमाई, तो देखा बस आ गई थी .... न जाने क्या सोच कर जाने दिया बस को ....... बस आई और चली गई उसे  से पता था अब अगली बस २० मिनिट बाद आएगी , कुछ लम्बी सी सांस लेकर उसने हलकी पैरेट ग्रीन साडी के लम्बे पल्लू से चेहरा पोंछ .. वापस ख्यालों में खो सी गई, एक दक्षिण भारतीय सभ्य महिला ने टाइम पुछा , वो खोई सी किसी और का ही चेहरा ढूंढ रही होजैसे ..... फिर भी ... हेलो मेडम ... की-ता-ना टाइम ... बताती आपकी घडी, वो कुछ न बोली .. उस महिला ने न मालूम क्या सोच कर .... झट से कहा .... इल्लै मलयाली ...  उसका सांवला रंग, काले लम्बे बालो की कमर के नीचे तक झूलती छोटी, चंचल निगाहों पर मुस्कुराता चेहरा देख उस महिला को वो उसी के जैसी लगी ... ये भी क्या कम है  में वो सबको अपनी सी लगती। शाम ढल चुकी थी ... हल्का अँधेरा पसर गया ... सावन का महिना भी कैसा होता है ....  खवाबो को दुनिया में कोई बादल मंडरा कर , कभी भी दिल की जमीं को भिगो जाता है और मन चंचल ... भीगी बरसातों में कुलांचे  भरने लगता है ... बारिश की बूंदों में नाचने लगता है ... खवाबो के हिंडोले में ... चम्पे-चमेली-मोगरे की रस्सी पर .... हरी घांस के मखमली पट्टे पर झूलने लगता है ... झूलते झूलते जब बादल की परछाई सूरज की रौशनी को खुद में समेत लेती तो फिर दिल घबरा उठता अनजाने डर से ... बस स्टैंड पर अब सारी बसे भरी आने लगी थी , थकी हुई सी अपनी फाइल को हाथो में सम्हाले पर्स को काँधे पर सम्हाले ...... साडी का पल्लू  सम्हाल ... उसने  महिला की बात पर मुस्कुरा कर ....  जवाब दिया,  माफ़ कीजिये  ... मेरी रिस्ट वाच खराब है, ... आप  किसी और से पूछ लीजिये और हाँ में तमिल  नहीं हु ,.... और मुस्कुरा दी .... उसकी  मुस्कराहट ऐसी की ... आस पास खड़े खड़े सभी के चेहरे मुस्कराहट स्वाभावत: ही आ जाती ... जादुई व्यक्तित्व, पर बहोत ही साधारन, ....  बादल  अचानक से  लगे ,... छोटी छोटी बूंदे .. हलकी झड़ी ... उसने अपना पर्स  छठा निकाल .... बैचेन निगाहों से ... इधर उधर देखने लगी .. ज्यों हिरनी को किसी शिकारी की गंध आ गई हो ... आँखें न जाने क्यों बहोत झपकती थी ...    अजीब उहापोश में थी की अब क्या करे बरसात  हो चली थी, पैरो में पानी की लहरे टकराने लगी, न जाने क्यों पास-पोर्ट ऑफिस के सामने के बस स्टैंड पर पानी इतना क्यों जमा हो जाता है, थोड़ी ही बारिश में ..... अब उसको दर लगने लगा था , बिजलीयां कड-कडाने लगी, दिल के आसमान पर यादों ने अंगडाइयां लेना शुरू कर दिया ... खोई खोई सी वो एक दूकान के छज्जे के नीचे  जा कड़ी हुई, ....निगाहे फिर भी उसी एक दिशा में लगी थी ... क्या मालुम .... वो ... क्यों बस में नहीं चढ़ रही थी ... बारिश बहोत तेज ... और ... तेज ... और ... तेज होती चली गई ...  दूर से लाल सिटी बस आते देख उसका रुआंसा चेहरा ...  सुस्त हो गया ... पैर थक गए थे .... ठण्ड से कांप सी रही थी ... बस में चढ़ने से पहले भी पीछे मुद कर देखा दूर दूर तक बारिश की बौछारों के धुंधलके के सिवा कुछ नज़र न आ रहा था , रोड लाइट की पीली रौशनी में ... सावन की बरसात के पानी की लहरे जामिन पर इठला इठला कर शोर कर रही थी ...... बस रवाना हो गई ... उसने देखा ... बस के पीछे कोई ... सुपरमैन की तरह दौड़ रहा है ... भाग रहा है ... उसका पीछा कर रहा है .... कोई परछाई जानी पहचानी सी .... कोई आवाज़ दे रहा है ..... बस पूरी तरह से अपनी गति पकड़ चुकी थी ..... ......... वो परछाई बहोत दूर तक उसका पीछा करती रही ... उसकी यादो में .......... और उसकी बातों में ....   परछाईयाँ   ...... और ... यादें .... एक ही तो बात है .. है न .... .......... 
   

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