शनिवार, 8 जून 2013

उस चिड़िया का किस्सा : उस चिड़िया का नाम : एक चिड़िया


उस चिड़िया का किस्सा : उस चिड़िया  का नाम : एक चिड़िया

Episode : 1

आँगन में, बगीचे में, घर के हर एक कमरें में ये चिड़ा-चिड़ि का जोड़ा, प्रेम-परिणय में बांध गया, बाहर खुले आँगन में बील, आंवला, चीकू, गुलाब, चंपा, चमेली, मोगरा के बूटें थे! अक्सर चिड़ा-चिड़ि उनके इर्दगिर्द प्रेम की लुका छिपी खेलते, बारिश में भीगते, पंख झाड़ते, एक दुसरे के सदा आगे पीछे उड़ते-बैठते . बील के पेड़ की टहनियों के एक त्रिकोण को चुना उन्होंने अपना नीड बसने के लिए. न मालूम उस अल्ल्हड़ से जोड़े में कैसे इतनी समझ आगे अचानक की अल-सुबह से ही दोनों तिनका चोंच में दबाये जुट जाते जल्दी जल्दी अपने प्यार की ईमारत बनाने में! खेलना लगभग बंद सा हो गया था, दोनों का एक ही मकसद कड़ी मेहनत कर अपना नीड बनाने का! हो भी क्यों ना उनके प्रेम- परिणय के साक्षी इस दुनिया में आने को तैयार थे! सुबह उठ कर घर के काम निपटाने में चक्कर घिन्नी सी, पति और दोनों बच्चो को टिफिन पकड़ा अपने अपने गंतव्य की ओर रवाना कर गेट बंद कर पंखा तेज कर लेट गई, कुछ देर बाद महसूस हुआ, आज अजब सी शांति ह क्या बात है, फिर याद आया, अरे आज चिड़ा-चिड़ि की कोई हलचल नहीं है, क्या हुआ, कहाँ गए दोनों, उठ कर सीधे बील के पेड़ पर बने घोंसले पे निगाह डाली, अरे ये क्या चिड़ा घोसले से दूर बैठा है चिड़ि आँखे बंद कर जैसे गहरी नींद में थी, मुझे अपनी जानी पहचानी सी जान कोई हलचल नहीं की, चिड़ि अपनी जगह से तस से मास नहीं हुई,  स्त्री स्त्री के मन की ना जान पाए, कहे न ये बात और है ! बड़ी अजीब है ये घर गृहस्थी ! अगली सुबह उठी तो देखा चिड़ि थोड़ी ही दुरी पर एक टहनी पर बैठी इधर उधर ऐसे देख रही है जैसे प्रधानमंत्री के बोडिगार्ड, घोसले पे नजर गई, तो देखा दो अंडे रखे है, जैसे ही मुझे देखा, चिड़ि उड़कर तुरंत उन अन्डो पर पंख फैला कर अपने में समेत कर बैठ गई, चिड़ा थोड़ी दूरी पर एक दो बार ची ची, ची ची , में हल्का संवाद संप्रेषित कर बैठ गया , फिर दो 3 दिन यु ही बीत गए, अगली सुबह बील के पेड़ के पास जाकर देखा, घोसले में दो नन्हे मुन्ने आँखे मूंदे बेसुध पड़े है, चिड़ि वही पास की डाल पर बैठी चोकिदारी कर रही है, बिलकुल नाजुक, जच्चा सी जियादा दूर नहीं जाती अपनी नीड से, हाँ अब वो चिड़ा चिड़ि फिर एक दुसरे के नजदीक बैठने लगे थे, -५ दिन में बच्चों की हलकी ची ची आने लगी, मन पुलकित हो उठता उनकी आवाज़ सुन, जैसे घर में कोई नए मेहमान आये हो! चिड़ा चिड़ि की  बोरियत दूर हो गई, उनको तो जैसे जीने का मकसद मिल गया हो, दोनों बारी बारी से उड़ कर जाते दाना पानी लाते बच्चो की चोंच में दाल फिर उड़ जाते, एक जाता तो एक बच्चो की निगरानी करता! यु ही चहचाहट से घर भरा भरा लगता, एक अच्छे पडोसी की तरह नाता था, बल्कि मुझ सा एक परिवार उस बील के तिराहे पे बसा था ! चिड़ा चिड़ि दोनों मिलकर दाना लाते खुद खाते न खाते बच्चो के मुह में डाल जाते, जैसे बड़े होकर ये बच्चे उनको कोंसी ख़ुशीयां ला देंगे, फिर भी माता पिता होने का फ़र्ज़ पूरी तरह निभा रहे थे! धीरे धीरे चिड़ा, कम आने लगा अपने घोसले में बच्चे बढे  हो  रहे थे उनमें भी एक चिड़ा और दूसरी  चिड़ी  थी, एक सृष्टि की नीव का निर्माण, हो रहा था, दोनों बच्चे घोसले से बहार सर निकाल कर चिं चिं करना शुरू कर दिया था, चिड़ा अब बहोत कम आता था कभी कभी दूर बैठ कर देका करता था, चिड़ी अकेले दाना लाती, दिन भर बच्चो को उड़ना सिखाती, दुश्मन से बचना सिखाती,शाम ढले घर आकर जीवन का मधुर संगीत गाना सीखती, कुछ पल आँखे मूँद उनको परमात्मा का स्मरण भी सिखाती और फिर रात की हलकी आह्ट के साथ निंदिया के आगोश में अपने दोनों और दोनों को चिपकाये  सो जाती! चिड़े का आना  बंद सा हो गया था ! चिड़ी ने अपना कर्म पूरी शिद्दत से जरी रखा, दाना लाना, खिलाना, दोनों को उड़ना सिखाना, उनसे संवाद करना रोजमर्रा के कामओ में कोई परिवर्तन नहीं, माथे पे कोई शिकन नहीं ,व्यवहार  में कोई  फर्क नहीं, हाँ बच्चे कभी थोड़ी दूर पंख फैला कर उड़  निकलते, चिड़ी अपने घोंसले में बैठी उनकी राह तकती, अपने खयालो में खोई खोई सी शुन्य में एक तक निहारती रहती, जैसे किसी के खयालो में बेसुध हो! दिल तड़प उठता उसकी ये हालत देख, गुस्सा आता चिड़े पर बीच मझदार छोड़ गया बैरी! फिर एक दिन चिड़ा आया, आया भी तो क्या आया एक चिड़ी साथ लाया! दूर बैठ कर चिड़ी को देखा वापस उड़ गया नयी चिड़ी के साथ ! चिड़ी अपने बच्चो को पंखो के साए में दुबका अपने घोंसले में से चुप चाप देखती रहती, हद्द तो तब हो जाती जब चिड़ा दूसरी चिड़ी को उस्के घोंसले में लाने की पुरजोर कोशिश करता,  अब चिड़ी को  डर था, अपना घोसला छोड़ कर कम ही जाती थी, कभी कभी ही जाती थी, चिड़ा पास की ही एक डाली पर दूसरी चिड़ी के साथ खेलता रहता, अपनी टेढ़ी निगाह घोसले पर भी रखता, में शायद समझ नहीं पा रही थी आखिर चल क्या रहा हा, लिकिन उस भोली चिड़ी ने चिदे की मंशा भाप ली थी, वो सौतन को उस बसे बसाये नीद की मालकिन बनाने का सब्ज बाग़ दिखा रहा था! हाय रे! प्रभु ये कैसी लीला इंसान की  फितरत से ये पक्षी भी अछूते नहीं है अनायास ही मुह से निकल पड़ा मक्कार-जा तेरा कुछ न रहे इस मासूम को ये दर्द क्यों दिया रे .......वो जो सौतन हावो भी तो हुबहू ऐसी ही है, फिर.....क्यों अपना पौरुषता पे दाग लगाया! चिड़ी अब दरी सहमी रहती लेकिन मुह से ची तक न करती अक्सर मुह खोल बुरी तरह हाँफते देखती तो टीस सी दौड़ जाती बदन में उसके दुःख की इन्तेहाँ देख कर, और लगता क्यों मुझे इसे देख इतना दर्द उठता है, मनो एक माँ की खेलती खाती बियाहता बेटी के जीवन में दुखो का सैलाब आ गया हो...... अनमनी सी में अपने काम में जुट जाती... न जाने कहाँ से वो अबला ... इतनी हिम्मत ले आई थी अपने घोसले में बैठी चिडे के सौतन के साथ अठखेली पे जाने का इंतिजार करती और जब सौत के साथ अय्य्याशी में मशगूल होता तो उड़कर कुछ दाना पानी का इन्तजाम करती, घर को ठीक करती. और घोंसले की रक्षा में तटस्थ रहती

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