शनिवार, 8 जून 2013

....है न कोई ओर न छोर ........




....है न कोई ओर न छोर ........
जब बैठती हु लिखने 
स्टडी टेबल के करीब
 हाथो में कलम और कलाम 
यादों में, कोरे कागज सा मन 
बेचैन हो लिखता है वक्त के पन्नो पर 
कुछ यादें , कुछ सपने और कुछ 
ख्वाब आधे अधूरे से , फिर कुछ 
पल ....  लगता है जैसे भागना 
चाहती हूँ हकीकतो के दल दल 
से दर कर, कहीं किसी किताब के शब्दों 
सी बैठ जोउ पन्नो में सिमट कर और 
कर लू खुद को जिल्द--जबान 
इस  में अनबुझ पहेली ये जीवन 
ये जीवन, हाँ ... ये जीवन जिस 
में जी चुकी कई सौ जीवन, हर पल 
मरना और हर पल का जीना 
एक दिव्या शक्ति अति शक्तिवान 
साहसी एक यात्रा है ये लिखना तेरा 
या के मेरा उन् संसारो में जिन का 
है ना कोई ओर न  छोर .....।      

लेखिका 
अनिता राठी
लेक्चरारमानव-विज्ञानसमाजशास्त्र /इंग्लिश लिट्रेचर 
जयपुर राजस्थान 

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