तरकश में तेरी अदायगी भर ले
शब्दों के ये नश्तर ना चला
मैं, तो यु ही कायल हु तेरे नाम का
तू मिलने की जद्दो जहद तो ना कर
ज़रूरी नहीं की बदनाम हो इश्क में
आइना भी जुबान रखता है
ज़माने की फ़िक्र नहीं, मुझे यु खुद
को खुद से बदनाम तो न कर ....
तरकश में चाहत की नज़्म है नश्तर फिर न जाने क्यों
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