....कौन जान पता जो उसने जान लिया था, ... बहोत ही ना समझ थी जब तक परिवारवालों ने सगाई कर दी थी, शादी की तारीख फिक्स हो गई थी , खरीददारी के लिए रोज रोज बाजार जाना,शोर गुल वैसे ही पसंद नहीं था, ... सोचती थी एक ही दिन में सब निबटा लू , शादी का सुर्ख जोड़ा,मैचिंग फुटवियर, सुहाग श्रृंगार का सामान, कोई भी साड़ी एक दूसरी के जैसी न हो , रंग, क्वालिटी,बनावट .. यहाँ की सिल्क वहां की सिल्क, बनारसी, कांजीवरम, पटोला और न जाने कौन कौन सी.....कैर बहोत अजीब सा मौसम था, फिर भी हर वक़्त, हर हाल में मुस्कुराती वो अपनी धुन में सब काम कर रही थी। ना मालुम क्या था जो उसको बार बार उदास कर , जाता सबने सोचा शादी के वक़्त सभी लड़कियां ऐसी ही हो जाती है समझ नहीं पाती खुश होए , या दुखी , खूब हँसे या रो ले दहाड़े मार मार कर ... ... नहीं नहीं ऐसा कुछ नहि… उसने चूड़ियाँ ली, मैचिंग की, और फूटपाथ पर लगे बाज़ार को देखती कब छोटी चोपड आ गई पता न चला , गर्मी से परेशान हो ,एक प्याऊ पर पानी पिया और सोचा ... बेटा ये मोटे भरी भरी कपडे इनमें तुम गश खाकर गिर पडोगी, ये साड़ियाँ उफ़ ... सोच कर दम सा घुटने लगा ... फिर सोचा कम से कम जब शो ख़तम हो जायेगा दूल्हा दुल्हन वाला तब कुछ कम्फर्टेबल पहन लेंगे, तो कुछ नया ऐसा खरीदे जिसमें सुकून मिले , नजर दौड़ी और सामने लाल रंग और सफ़ेद रंग की बारी मल मल के कपडे पर ठहर गई, .... वाह इस से आरामदायक और क्या हो सकता है ..... शादी की तैयारी कर रही हो ये तो ज़रूर ले ही लो, दोनों हाथो में शादी का जोड़ा, श्रृंगार का सामान चूड़ियाँ , सब कुछ लिए आखिरी पड़ाव मान दुकानदार से अंकल ये कपडा क्या भाव दिया ... ये ... आपकी दूकान में दो तीन ही कलर है , लेकिन ये कपडा मुझे बहोत भ रहा है , दुकानदार उसको एक टक निहारता रहा, गुरा के बोली ऐसे क्या देखते हो ... बेचना नहीं है क्या, आलसी कहीं के , देखो मेरी बस निकल जाएगी,सामने मेरी बस तैयार खड़ी है, जल्दी से एक लाल मलमल के थान में से .... मेरी ओढनी का कपडा काट के पैक कर दो ..... ये लो पांच सो का नोट जो बनता है काट लो भी क्या याद करोगे ..मोर मोल भाव नहीं करुँगी .... क्योंकि शादी की शौपिंग का आखिरी सामान आपसे ही ले रही हु न इसी लिए .............. दुकानदार .... व्यापार ....व्यापार होता है बेटी लेकिन तेरे भोलेपन में एक ऐसी कह दी ............. हाँ ..... शादी के सामान के साथ साथ .... ये .... आखिरी सामान भी तू ही खरीद ले ना मालूम पराये घर जा कर ये भी नसीब हो न हो .... लड़की ..... की मासूम आँखों में आंसू चालक आये, क्यों अंकल ...क्या हुआ ...दुकानदार हाथ जोड़ सामने खड़ा था ..... बेबस हु बेटी आज ये सौदा नहीं करूँगा ..... ये कफ़न की दूकान है……… तुम जाओ बस पकड़ो घर जाओ ........ दोनों की आंखो में आंसू .... के कुछ न था ….
लेखिका
जयपुर , राजस्थान
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जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
हटाएंआखिरी खरीदारी आत्मा पर बोझ हलका हुँआ।
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