मंगलवार, 18 जून 2013

yaadein - 8


यादें....yes... यादें कभी भी कहीं भी , फ़्लैश बेक में ..... कितना  जादुई आकर्षण था उस की आँखों में ...  पलके एक बार पलके   उठा के देख लेती तो हरसिंगार खिल उठते, दूर से उसकी काली लम्बी चोटी उसका  करवा देती,   जितने लोग आस पास के देखते फिर   देखते जब तक वो चली न जाती...  झिलमिलाती जिन्दगी की रौशनी थी, मुस्कुराहटो का मेक - अप करती थी बस, कुछ दिन  वर्किंग वीमेन हॉस्टल में, ... अपने अल्हड मद मस्त व्यवहार से  सबका मन जीत लिया था, शाम को पीने का ताजा पानी भरती,  गैस पर  टी - पैन रखा होता, पानी बह रहा होता ... हॉस्टल के किसी  और कमरे से ... अगर ..  खलनायक फिल्म का गाना ....आइटम सोंग ... ....   चुनरी के नीचे ... सुने दे जाता , वहीँ डांस शुरू कर देती, फिर चाय का भी धुआँ निकल जाता उसका डांस देख कर ... पानी का घड़ा छलक छलक जाता ....  हॉस्टल उसके साथ नाचने लगता .... दिन भर ऑफिस के काम की थकान तनाव सब  गायब हो जाता ... ऐसी थी वो सुना था ... सुप्रीति सेनगुप्ता,  शहर में नई  है  बंगाल के किसी गाँव से ..... अपने में मस्त रहती ... एक दो  महीने जाना नहीं हो पाया हॉस्टल ... एक दिन सुप्रीति को हॉस्टल के गेट पर खड़े देखा ..   पास ही सब्जी मंडी थी ... पापा के साथ सब्जी  लौट रही थी , मुच्छड़ चौकीदार के डर  से वो गेट से बाहार  नहीं आ सकी, लगा इतनी देर  गेट पर क्यों खड़ी है, .... पापा के डर से उस से बात नहीं की ...... अगले दिन हॉस्टल  जाने का सोच ही रही थी की ...   न्यूज़ पेपर की फ्रंट हेड  लाइन पर  नजर गई .... वर्किंग वीमेन हॉस्टल के  कमरे में युवती ने की आत्महत्या ...  सुसाइड नोट में लिखा .... मेरे गाँव का लड़का तुम जैसा पत्थर दिल नहीं हो सकता की जीवन साथी बनाने का वादा कर मुकर जाये वो भी साथी और खुद के बच्चे दोनों से ...... सुप्रीति।  मैं तो  सकते में पड़ गई और फिर ... फिर क्या , उसे क्या हुआ था , .... शहर के लोगो का छूत के रोग से वो  बुरी तरह  घायल  हो  गई  थी ..
.  शहर के रोग ...  ये ... शहर के लोग पता नहीं कब लगा देते है .... बहोत दुखदाई होते है, शहरों के लोग ... और ... शहरों के रोग  दोनों ...........

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